यथार्थवादी चिंतन क्या है? यह अभिसारी चिंतन से कैसे भिन्न है?

यथार्थवादी चिंतन शिक्षक पात्रता परीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है यथार्थवादी चिंतन विषय में ही हम अभिसारी चिंतन , सृजनात्मक चिंतन एवं आलोचनात्मक चिंतन को भी शामिल करते है | क्यूंकि बहुत बार अभिसारी चिंतन से प्रश्न हरियाणा शिक्षक पात्रता परीक्षा में प्रश्न आता है|  तो चलिए जानते है कि यथार्थवादी चिन्तन क्या है और यह अभिसारी चिंतन से कैसे भिन्न है ?

 

यथार्थवादी चिंतन क्या है? यथार्थवादी चिंतन अभिसारी चिंतन से कैसे भिन्न है?यथार्थवादी चिंतन क्या है? यथार्थवादी चिंतन अभिसारी चिंतन से कैसे भिन्न है?




 

यथार्थवादी चिंतन का अर्थ :

यथार्थवादी चिंतन वह चिंतन है जिसका संबंध वास्तविकता से होता है वास्तविक धटनाओ से तथ्य लेकर हम किसी  भी समस्या का समाधान कर पाते है।

यथार्थवादी चिंतन का एक उदाहरण

मान लीजिए किसी स्कूल में शिक्षक बच्चों को रोज़ाना नहीं पढ़ा रहे हैं। अगर यह बात उस शिक्षक प्रशिक्षक (टीचर एजुकेटर) को पता नहीं है जो उस स्कूल को सपोर्ट कर रहे हैं तो फिर शिक्षक के कौशल और ज्ञान पर काम करने का कोई फ़ायदा बच्चों के अधिगम पर नहीं होगा।

क्योंकि बच्चों के साथ तो रोज़ाना काम हो ही नहीं रहा है। अगर इस वास्तविक मसले पर शिक्षक के साथ संवाद होता है तो संभव है कि कोई समाधान निकल पाए, वर्ना वास्तविक परिस्थिति के संज्ञान के अभाव में समस्या ज्यों की त्यों कायम रहेगी।

शिक्षा मनोविज्ञान में यथार्थवादी चिंतन तीन प्रकार हैं

  • अभिसारी
  • सर्जनात्मक
  • आलोचनात्मक चिंतन।

अभिसारी चिंतन

अभिसारी चिंतन को निगमनात्मक चिंतन भी कहते हैं। अभिसारी चिंतन में दिए गए तथ्यों के आधार पर व्यक्ति किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश करता है।

अभिसारी चिंतन का एक उदाहरण

भारत के कुछ राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान इत्यादि के बहुत से विद्यालय में एक ही शिक्षक कार्यरत हैं। मध्य प्रदेश में एकल विद्यालयों (सिंगल टीचर स्कूल) की संख्या भारत में सबसे ज्यादा है। उत्तर प्रदेश में भी बहुत से स्कूल एकल शिक्षकों के भरोसे संचालित हो रहे हैं।

इसके आधार पर एक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में एकल शिक्षकों की मौजूदगी प्राथमिक स्तर पर एक गंभीर चुनौती है।

इस तरह के चिंतन में व्यक्ति अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त अनुभवों को एक साथ मिलाकर उनके आधार पर एक समाधान खोजता है।

सर्जनात्मक चिंतन

सृजनात्मक चिंतन को आगमनात्मक चिंतन कहते हैं। सृजनात्मक चिंतन में व्यक्ति दिए गए तथ्यों में कुछ नया (अपनी सोच या तथ्य ) जोड़कर एक निष्कर्ष तक पहुंचता है। जब तक व्यक्ति इन नए तथ्यों को अपनी ओर से नहीं जोड़ता, अर्थात तथ्यों का सृजन नहीं करता तब तक समस्या का समाधान नहीं हो पाता है।

सृजनात्मक चिंतन का एक उदाहरण

उदाहरण के लिए एक कॉलेज में बच्चों के नियमित न आने की समस्या थी। उस कॉलेज ने उन बच्चों के पास SMS भेजने शुरू किये जिस दिन वो बच्चा कॉलेज नहीं आता है।

इस तरह से SMS के जरिए बच्चों के नियमित कॉलेज आने और उनके सीखने के बीच का संबंध बताकर परिवार को बच्चों को नियमित स्कूल भेजने के लिए कहा गया, इसका काफी सकारात्मक असर हुआ। यानि एक समस्या का समाधान करने के लिए कुछ नयी सोच को लागु किया गया | अर्थात जब जब पहले से किये जा रहे कार्य में नहीं सोच को लाया जाएगा तब तब उसे सृजनात्मक चिंतन कहा जाएगा |

भविष्य भारतीय अर्थवयवस्था कैसी होगी? भविष्य की शिक्षा कैसी होगी? भविष्य में परिवार की संरचना एकल होगी या संयुक्त होगी? अगर दुनिया में व्यक्तिगत विभिन्नता नहीं होती तो क्या होता? भविष्य में भारत में तकनीकी का क्या असर होगा? अगर मेरे कॉलेज को पहिये लग जाए तो कैसा होगा? इत्यादि सवाल और जवाब सृजनात्मक चिंतन का उदाहरण हो सकते हैं।

ये आवश्यक नहीं कि हर बार सृजनात्मक चिंतन किसी समस्या का समाधान करने के लिए ही हों। वे मनोरंजन के लिहाज़ से भी हो सकते हैं। कविताये लिखना , कहानियां लिखना, गजल गाना, शायरी करना या  गीत लिखना  इसके उदाहरण हैं। दार्शनिक विचारों को भी सृजनात्मक चिंतन कहा जा सकता है|

आलोचनात्मक चिंतन

आलोचनात्मक चिंतन में हम किसी वस्तु, घटना या तथ्य की सच्चाई को स्वीकार करने से पहले उसके गुण-दोष की परख करते है।

हम अधिकतर टेलीविज़न, अख़बार और लोगों की कही-सुनी बातों को सच मान लेते हैं। उसके बारे में खुद सोचते नहीं हैं। इस स्थिति में कहा जाएगा कि हमारे में आलोचनात्मक चिंतन का अभाव है।

आज के सोशल मीडिया के ज़माने में आलोचनात्मक चिंतन समस्या समाधान उपयोगी हो सकता है। ऐसे लोगों के विश्लेषण को लोग पढ़ना-सुनना पसंद करते हैं क्योंकि ऐसे लोग किसी समस्या या परिस्थिति के विभिन्न पहलुओं की ऐसी व्याख्या करते हैं जिससे उसे समझना आसान हो जाता है।




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